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Nirupama Mishra

Abstract

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Nirupama Mishra

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मासूम चेहरा

मासूम चेहरा

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मासूम - सा चेहरा 

जिसे देखा मैंने तो बस देखती रही

उस चेहरे पर सागर की तरह

शांत -गहरी आँखें

बहुत बारीकी से देखती हैं 

दुनिया के रंग-ढंग,


यूँ ही तो कहती नहीं वो आँखें 

हर किसी से अपनी बातें 

टटोलती रहती हैं सामने वाले की 

समझ के परदों पर कोई धूल तो नहीं,


परखती हैं उस मासूम से चेहरे की निगाहें

सामने वाले की निगाहों को 

फिर निश्चिंत होकर अपने होठों

को देती हैं इजाजत , करती हैं इशारे 

कि कहो जो भी कहना है,


सजाये जाते हैं फिर बातों के गुलदान में 

अनुभवों के तरह - तरह के किस्से 

सोच - समझ के मिलान का सुकून 

उस मासूम-से चेहरे की आँखों में 

झलकने लगता है 

कि सच में हम जैसे हैं 

वैसा ही हमें कोई तो समझता है|


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