माँ
माँ
जीवन का हर सार ,बताती माँ।
निज तन मन के दर्द,छुपाती माँ।।1
समझ न आई बात,सुनी है जो,
कैसे सब घर द्वार ,चलाती माँ।।2
छुपा डाँट में प्यार,हमेशा ही,
भरे आँख में नीर,लुभाती माँ।।3
भले अँगूठा टेक ,न सूझे है ,
पर व्यंजन स्वादिष्ट,बनाती माँ।।4
सदा सभी से दूर ,रहे पीड़ा,
घर में पूजा पाठ,कराती माँ।।5
सब दुख जाते भाग, सही मानो,
जब सिर अपना हाथ,फिराती माँ।।6
देकर संतति जन्म,करे पालन,
इसीलिए भगवान,कहाती माँ।।7
