मां
मां
जिसे पढ़ा हमने एक अक्षर में,
उसको शब्दों में बयां न कर पाए।
जिसने अच्छे - बुरे में फर्क बताए,
उसने हरदम कर्तव्य निभाए।
कभी जो गुस्से में डांट देती,
रोने लगे तो चुप कराती..
रूठने वहीं तो हमें मानती।
आंखे खोली थी जब पहली दफा,
उसका चेहरा ही देखा..
ज़िन्दगी का हर लम्हा,
उससे ही जीना सीखा।
उसकी गणित है कुछ बिगड़ी - सी..
मांगे बच्चा आधी रोटी,
खिलाती तो वो पूरी ही।
सजाए तो बहुत है उसने भी सपने,
पर नहीं है वो सब उसके अपने..
सपने तो मात्र घर - परिवार के,
अब तो इच्छाएं भी लगी है उसकी मरने।
हज़ार गम सहकर भी रखती सबका मान,
ख्वाहिशें पूरी करने में लगा रही है जान।
जो है संयम का सागर,
और है दया की मूरत..
भीतर से जान लो अगर,
तो वो है सबसे खूबसूरत।
क्या अब भी न जाने ,
ये है किस महान की बाते?
दुनिया भर में ढूंढ लो,
मिलेगा तुम्हें कोई ना..
क्योंकि ये हैं,
घर में बैठी तुम्हारी ' माँ ' ।
