गरीबी
गरीबी
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मजदूर नहीं थकते, पर अफ़सर हांफ जाते हैं..
इतने परिश्रम के बाद भी,ये
एकदीन के हक का सेठ ही खा जाते हैं।
कोई महलों में जिंदगी बिता रहा है,
कोई सड़को की रोटी से ज़िन्दगी बचा रहा है।
ऐ भगवान आपसे प्रार्थना है मेरी...
धन बरसे या न बरसे,
लेकिन रोटी के लिए कोई न तरसे।
उसुलो का नहीं ये तो वसूली का ज़माना लगता है,
अपना कर्ज़ चुकाने को गरीब दिन - रात जलता है।
गरीब मीलों चलते है, भोजन पाने के लिए..
अमीर चलते है बस उसे पचाने के लिए।
सब पता उसे दुनिया की सुविधाओं का,
पर बीत रहा उसका जीवन दुविधाओं का।
सपने दो चार है, परेशानियां हज़ार हैं...
फिर भी वो कड़ी मेहनत करने को तैयार है।
सोचते होंगे की कब सुधरेगी हमारी ज़िन्दगी..
क्या हमेशा ऐसी ही रहेगी हमारी गरीबी..?
