STORYMIRROR

Shibangi Das

Abstract

4  

Shibangi Das

Abstract

माँ

माँ

1 min
310

आज तक सिर्फ़ माँ के बारे में

कविताएँ पढ़ कर

या कई कहानियाँ सुनकर

मेरे मन में

थोड़ी हमदर्दी जागा करती है।


ऐसा नहीं मैं उनकी

फ़िक्र नहीं करती

पर उनके दिन भर के मेहनत

का अंदाजा होकर भी

मैंने उन्हें अनदेखा भी

कई बार किया है।


माँ नहीं होती घर पर तो

जैसे सब तहस नहस हो जाता है

माँ है तो सुकून है

ये तभी समझ आता है।


हर वक्त बस चिल्लाया करती है

तो गुस्सा बड़ा आता है

पर उसकी आवाज भी न सुनूँ

तो दिन मेरा मायूसी में डूब जाता है।


उसकी मुझसे हमेशा शिकायत रहती है

कि मैं उसका दर्द नहीं समझती

ऐसा नहीं है

बस समझकर ना समझ हूं बनी रहती।


मेरे लफ़्ज़ों से उसके मरहम भर पाऊँ

बस यही कोशिश रहती है

अपने आलस को भगाकर

उसकी अपेक्षायें पूरी कर पाऊँ

बस यही कोशिश रहती है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract