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श्रेया जोशी 'कल्याणी'

Abstract

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श्रेया जोशी 'कल्याणी'

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 लहरों पर भागता  बचपन

 लहरों पर भागता  बचपन

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सुनहरी लहरों पर भागता बचपन,
पाँव-पाँव लिखता पानी पर सपने।
पीठ पर सूरज की हल्की ऊष्मा,
खुली आँखों से देखे कल चमकते अपने।

छपाकों में घुली हँसी,
डूबते सूरज से बातें करती।
हाथों की मुट्ठी में कैद न हो पाती,
फिर भी हर लहर में लौट‑लौटकर मिलती।

नंगे पाँव, भीगे बाल,
दिन भर की थकान से अनजान।
समुद्र के लंबे आँचल पर,
बचपन लिखता अपना छोटा आसमान।


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