लौट आए हम
लौट आए हम
नहीं मालूम
तुम्हें यह सुन कर कैसा लगे
कि अब मैंने स्वयं को
संभाल लिया है
बन कर मजबूत
टूटने से बचा लिया है
अब नहीं होती
वो बेचैनी, वो कशिश
तुमसे दूर रह कर
नहीं मचलता दिल रात दिन
नहीं तकती ये निगाहें
हर वक्त तुम्हारी राह
और न ही होता है हर बात में
तुम्हारा ही जिक्र
क्योंकि शायद इतना सहा है मैंने
तुम्हारी जुदाई का गम
कि शायद
उस सहने की सीमा के आगे
कुछ था ही नहीं
कि उस अंतहीन टूटन ने ही
अंततः मुझे जोड़ दिया है
और न चाहते हुए भी मैंने
हालात से समझौता कर लिया है
और रुक नहीं गई यह जिंदगी
तुम्हारे जाने, बदल जाने से
कि दस्तक दी नई मंजिल ने
और हम चल पडे नई राह पर
समेटे पुराने अनुभव अपने साथ
जैसे सुबह का भूला
लौट आए शाम को घर अपने
यह सब सुन कर
शायद तुम हो जाओ
मुक्त एक बोझ से
या फिर हो जाओ उदास
बीते लम्हों की याद से
या शायद झुंझला उठो
और तुम्हारे अहं पर लगे चोट
कि हम क्यों नहीं रह गये
बिखर के तुम बिन
और शायद टूट जाए
तुम्हारा यह भ्रम
कि हमारा वजूद
सिर्फ तुमसे था।
