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Sunriti Verma

Classics Inspirational Others

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Sunriti Verma

Classics Inspirational Others

क्यों मानते मनुष्य विद्या को एक व्यापार ?

क्यों मानते मनुष्य विद्या को एक व्यापार ?

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क्यों मानते मनुष्य विद्या को एक व्यापार ?

क्या यही है कलियुग का सार? 

निश्चित यह हमारी ही है हार। 

कर के हर सीमाओं को पार

क्यों यह समाज बनाना चाहती है विद्या को व्यापार ?


इस दुष्कर्म के आधार

पर सबको क्या व्यक्ति देगा मार ?

संसार के क्या टुकड़े कर देगा चार ?

क्या व्यक्ति भुला देगा स्वयं के संस्कार ?

क्यों यह समाज बनाना चाहती है विद्या को व्यापार ?


क्या सत्य में इस नीच मानसिकता का

सफल होगा यह किया हम पर वार ?

कहीं मनुष्यों के इस दुष्कर्म से नष्ट न हो जाए यह संसार !

यह पाप जिसका कठिन है उपचार। 

मनुष्य क्यों इस संपूर्ण सृष्टि पर मानते स्वयं का अधिकार ? 

क्यों यह समाज बनाना चाहती है विद्या को व्यापार ?


जिन दायित्वों को करना था स्वीकार 

उन्हीं को दिया दुत्कार

क्यों यह जाति बनाना चाहती

इनके समक्ष सब को अपने अधीन कर के लाचार ?

क्यों इस संपूर्ण सृष्टि पर मानते स्वयं का अधिकार ?


जिस वैदिक ज्ञान के भंडार 

के ज्ञान से करना चाहिए प्रत्येक के समक्ष

उज्जवल भविष्य को साकार।

परंतु यहाँ न जाने क्यों यह समाज

बनाना चाहती है विद्या को व्यापार ?


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