क्यों मानते मनुष्य विद्या को एक व्यापार ?
क्यों मानते मनुष्य विद्या को एक व्यापार ?
क्यों मानते मनुष्य विद्या को एक व्यापार ?
क्या यही है कलियुग का सार?
निश्चित यह हमारी ही है हार।
कर के हर सीमाओं को पार
क्यों यह समाज बनाना चाहती है विद्या को व्यापार ?
इस दुष्कर्म के आधार
पर सबको क्या व्यक्ति देगा मार ?
संसार के क्या टुकड़े कर देगा चार ?
क्या व्यक्ति भुला देगा स्वयं के संस्कार ?
क्यों यह समाज बनाना चाहती है विद्या को व्यापार ?
क्या सत्य में इस नीच मानसिकता का
सफल होगा यह किया हम पर वार ?
कहीं मनुष्यों के इस दुष्कर्म से नष्ट न हो जाए यह संसार !
यह पाप जिसका कठिन है उपचार।
मनुष्य क्यों इस संपूर्ण सृष्टि पर मानते स्वयं का अधिकार ?
क्यों यह समाज बनाना चाहती है विद्या को व्यापार ?
जिन दायित्वों को करना था स्वीकार
उन्हीं को दिया दुत्कार
क्यों यह जाति बनाना चाहती
इनके समक्ष सब को अपने अधीन कर के लाचार ?
क्यों इस संपूर्ण सृष्टि पर मानते स्वयं का अधिकार ?
जिस वैदिक ज्ञान के भंडार
के ज्ञान से करना चाहिए प्रत्येक के समक्ष
उज्जवल भविष्य को साकार।
परंतु यहाँ न जाने क्यों यह समाज
बनाना चाहती है विद्या को व्यापार ?
