क्या तुम समझ पाओगे
क्या तुम समझ पाओगे
ग़र लिखूंगा इश्क़ मैं
फिर इज़हार करुंगा बेख़ौफ़
माँगूगा तुझे अपने रब से
इबादत करुंगा मैं रोज़
क्या तुम समझ पाओगे
रात को दिन लिखूंगा
और दिन को रात लिखूंगा
चंदा को आफ़ताब कहूँगा
आफ़ताब को मैं चाँद कहूँगा
क्या तुम समझ पाओगे
वो ज़ुल्म तुमसे करवाते रहेंगे
तुम नादान बनकर ज़ुल्म करते रहना
यूँ मुसलसल चर्चा तुम करते रहना
देखना तुम खुद एक दिन खबर बन जाओगे
क्या तुम समझ पाओगे
वो जान देंगे सरहदों पर खातिर तुम्हारे
बस तुम पोर पर ज्ञान पेलते रहना
अस्मत लुटेगी सरेआम सड़को पर
तुम बस उनकी जयकार करते रहना
क्या तुम समझ पाओगे
फुटपाथ पर छोटे छोटे बच्चे होंगे
नंगे और भूख से वो बिलखते होंगे
ज़िंदगी तो खुशहाल तुम्हारी होगी
किसान तो आत्महत्या ही कर रहे होंगे
क्या तुम समझ पाओगे
आज नहीं समझे ग़र इन दस्तानो को
फिर कभी ना समझ पाओगे
ख़तम होगा फिर समझाने समझाने का दौर
नतीजन यही हालत खुद की नस्लों में पाओगे
बताओ क्या तुम समझ पाओगे।
