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Habib Manzer

Abstract

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Habib Manzer

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कुछ याद है अब तक सीने में

कुछ याद है अब तक सीने में

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क्यों आग लगी है सीने में

क्यों दर्द उठा है सीने में

एक लौ है ज़ेहन में अब मेंरे 

कुछ याद है अबतक सीने में


एक राज़ छुपाना मैं चाहा

कुछ बात बताना मैं चाहा

कुछ ख्वाब मुझे सोने ना दे

लम्हात हसीन हैं सीने में


एक सुबह उदासी ले आई

एक शाम घटा फिर से छाई

उम्मीद अभी कुछ ज़िंदा है

नग़मात मोहब्बत सीने में


एक ख्वाब अधूरा है मेरा

एक फिक्र ज़ेहन में है मेरे

एक याद कसम दिलको मेरे

सदमात मोहब्बत सीने में


एक चाँद कभी बादल में था

एक चाँद हसीन मेंरे दिलमें था

कुछ वक्त बिताया साथ तेरे

जज़्बात मोहब्बत सीने में!


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