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Sahil Singh

Tragedy Thriller

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Sahil Singh

Tragedy Thriller

कोरोना, शहर ओर हम।

कोरोना, शहर ओर हम।

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आज शहर के आसमानो में कुछ गांव जैसी रंगत है,

आया हम सब पर क्या कोई भयंकर संकट है ?


छतों पर अब फिर से हर सुबह चिड़िया चहकने लगी है,

माटी इस देश के हर चप्पे की एक सी महकने लगी है।


सड़को पर मोटर गाड़ी नही बस एक सन्नाटा है,

जैसे प्रकृति ने फिर से इंसान की सीमाओ को बांटा है।


तौर तरीके इतिहास के हमे याद आने लगे है,

सिर झुका कर हाथ फिर से सब मिलाने लगे है।


जानवर आज अपनी धरती पर खुल कर घूम रहे है,

और पालने का शोक रखने वाले पिंजरों में कैद है।


प्रकृति को छेड़कर इंसान का घमंड तिलमिलाया है,

कह रही है धरती भी मुझे तुमने क्यों ऐसा बनाया है।


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