कोल्हू का बैल
कोल्हू का बैल
मक़सद तो बस ईश्वर ही जाने
इस दुनिया में उस के आने का-
उस के होने का।
ख़ुद को समझने का
मिला ही कब मौका
बड़ी बड़ी आशाएं तो दूर
छोटी सी, च॔चल सी
इक आस को भी
पनपने का न देना है मौका !
अंकुरित होने की, उगने की
कतई इजाज़त नहीं।
है गुनाह के बराबर
देखना एक छोटा सा भी सपना।
बनी है वह औरों के लिए
बने खिलौना, करे तीमारदारी
झुका कर सर अपना।
आंसू पलकों तक पहुंचने की
कभी करें न जुर्रत
पी जाए अन्दर ही अन्दर
हर आस पर, हर सपने पर
समझौतों की जमती रहती परतें
ज़िन्दगी के हर कदम पर
सीख मिली बचपन से जो
करे उसका आदर
बनी रहे कोल्हू का बैल
मुस्कान मगर याद रहे,बनी रहे सदा।
समझौतों से समझौतों की शुरुआत ,
उस पहली कड़ी का शुभारंभ
होता है उसी घड़ी से
जब वह छोटी सी जान
बन जाती है हमारी दुनिया का हिस्सा।
बेटे के आने का था इंतज़ार
आ गई कैसे यह बिन मांगी बेटी
बन कर मेरे जीवन का नासूर ?
बन बैठी बोझ सभी पर
न अपनों से न ग़ैरों से
कर सके अपेक्षा संवेदना की
बोझ ख़ुद पर,बोझ इस धरती पर..
ढोती ही रही आजीवन बोझ,
बन कोल्हू का बैल।
मिली हिदायत बचपन से,
उठना -बैठना,पहनना -ओढ़ना
तकल्लुफ़ात निभाना -
तौर तरीकों की अनगिनत मिसालें-
जिन्हें नज़रअन्दाज़ करने का प्रयास भी
माफ़ी का हक़दार नहीं।
'मैं यही हूं चाहती', 'यही करूंगी '
है बेहूदगी की इंतेहा !
बेटियां होती हैं पराया धन
औक़ात कभी न भूलें अपनी।
बनी रहें कोल्हू का बैल।
तभी तो होगी गिनती उनकी
आदर्श, स॔स्कारी बहुओं में
यह दुनिया देगी उसे वह अनमोल पहचान
जब हीन भावना से ग्रस्त
धकेल देगी अपने वजूद को
एक गहरी खाई में
जहां उसकी परछाई भी
न फटक सकेगी पास
नारी जाति का बन इज़्ज़त और सम्मान
बनी रहे कोल्हू का बैल
दुनिया की नज़रों में कर ले जीवन सार्थक
बनी रहे कोल्हू का बैल।
आयाम धीरे धीरे बदल रहे हैं,
मगर आगे का रास्ता अभी लम्बा है !
