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Ravi Jha

Abstract

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Ravi Jha

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कोई रोके नहीं

कोई रोके नहीं

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न रोकेगा कोई न टोकेगा कोई 

क्या बोलेगा कोई क्या देखेगा कोई 


इस गुलशन में फिर से आएगा कोई 

दिल ही तो है फिर से तोड़ेगा कोई।


ये दिल पत्थर है समझता हर कोई 

पत्थर भी पिघलता ये समझेगा कोई 


साथ तेरा होता तो ये मुमकिन होता 

पर नही है तो ये नामुमकिन भी नहीं।


अभी अकेला है पता नहीं कल भी रहेगा 

तेरी यादों के सहारे वह फिर भी जी लेगा


उन पलों को याद करके फिर रोएगा कोई 

क्या कभी किसी ने रोका है जो अब रोकेगा कोई।  


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