STORYMIRROR

ritesh deo

Abstract

4  

ritesh deo

Abstract

किताब और ज़िंदगी

किताब और ज़िंदगी

1 min
312

कम लगता है.....


हर इन्सान एक किताब है,

पढ़ कर कुछ पन्ने ही,

बेहतर लगता है....

क्योंकि, कितना भी जानो, किसी को, कम लगता है......


बंटे हैं लोग, अक्षरों और शब्दों में,

सजे हैं लोग, ख़ूबसूरत कहावतों और मुहावरों से,

काम वो करते हैं जो,

उससे अलग उनका ,नाम होता है,

हैं वो, सच में क्या, ये भरम रहता है... 

कितना भी जानो, किसी को ,कम लगता है...


किसी की ज़िन्दगी में है, सबकुछ हिसाब से,

मतलब है उन्हें सिर्फ, नफ़ा और नुकसान से,

जोड़, घटाना, गुणा और भाग, उनके जीवन में आम होता है,

देख कर उन्हें , अपनी असफलता से डर लगता है...

कितना भी जानो किसी को, कम लगता है...


कुछ लोग ,बिना अर्द्धविराम और विराम के,

चलते हैं निरन्तर अपने पथ पर,

करते हैं मुक़ाबला ज़िन्दगी से, डट कर,

बनते हैं प्रेरणा किसी की और सबक किसी का..

समझने और पढ़ने में इन्हें वक़्त लगता है...

कितना भी जानो किसी को, कम लगता है.....

पढ़ कर कुछ पन्ने ही बेहतर लगता है....



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract