STORYMIRROR

Surendra kumar singh

Abstract

3  

Surendra kumar singh

Abstract

ख्वाहिशों ठहरो

ख्वाहिशों ठहरो

1 min
202


ख्वाहिशों ठहरो जरा

हम किसी की आंख में ही रह रहे हैं

फिर उसी के साज पर ही बज रहे है

और इसी एहसास से दो शब्द लेकर

भोर की बहती हुई हवा में उड़ रहे हैं

ख्वाहिशों

देखो जरा

तुम नहीं तो जिंदगी का ये नया अंदाज है

तुम नहीं तो जिंदगी का ये नया आगाज है

मैं इसी की कल्पना का रूप बनकर

वक्त की सरगोशियों में घुल रहा हूँ

ख्वाहिशों

समझो जरा

तुम को भी तो रूप का, आवरण मिलने लगा है

तुमको भी भटकाव में रास्ता दिखने लगा है

मैं इसी हालात को एक रंग में रंगते हुये

भागता, गिरता, ठिठकता मौज में ही जी उठा हूँ।

ख्वाहिशों सोचो जरा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract