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GUDDU MUNERI "Sikandrabadi"

Abstract

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GUDDU MUNERI "Sikandrabadi"

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खुदगर्जी

खुदगर्जी

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तुम क्या थे और क्या हो गए 

एक ग्लास ही मांगा था तुमसे 

और तुम हो कि पानी पानी हो गए 


तुम सा न कोई मिला हमे 

दो बातें करनी थी जरा 

और तुम हो कि सानी सानी हो गए 


भीगी पलको से टपकता पानी

बस एक मुलाकात करलो 

और तुम हो कि बरसाती हो गए 


बिना देखे, बिना सुने मुहब्बत कैसी 

कुछ अल्फाजो मे रात कर ले 

और तुम हो कि हिसाबी हो गए 


खुदगर्ज बनकर ना बैठो 

मुझे ढाई लफ्जो क्या ज्ञान दे दो

और तुम हो कि नौ दो ग्यारह हो गए 


तुम खुशियों के बाजार से सही

मुझे बस मुस्कुराहट का हार चाहिये 

और तुम हो कि काँटो के तार हो गए 


भूल जाओ ए खुदगर्ज मुझे तूम

अब ना कोई गुफ्तगु चाहिये 

और तुम हो कि आँखों में तस्वीर हो गए।


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