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Atiendriya Verma

Abstract

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Atiendriya Verma

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खुदगर्ज

खुदगर्ज

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ए आईने बता बता मुझे बता 

ये समाज इतना खुदगर्ज हुआ -  

कहीं नवजात शिशु को मरते हुए देखा 

कहीं पे बूढ़े माता पिता को आश्रम जाते देखा 

कहीं मां की ममता की हत्या होते हुए देखा 

कहीं पे पिता का गर्व टूटे हुए देखा 

कहीं पे बेटियों को अपमानित होते हुए देखा है

कहीं पे अपनों को अपनो के खिलाफ जाते हुए देखा है 

कहीं पे दो गज जमीन को रिश्ते टुटते हुए देखा है 


ए आईने बता बता मुझे बता 

ये समाज इतना खुदगार्ज कैसे हुआ  

रूप रंग और रंक बदलते हुए देखे है 

रूप रंग और रंक बदलते हुए 

देखे हैं

गिरगिट से जादा लोग को बदलते हुए देखा है

मैने लोगो को खुद से खुदगर्ज होते हुए देखा है 

पड़ा था हमने जूलियट और सीजर के बारे में 

मार्क एंटोमनियो और ब्रूटस के बारे में आज देख भी लिया है 

की हर अपना कहने वाला अपना नही होता हर ब्रुट्स कोई मार्क एंटनी नही होता 


ए आईने बता बता मुझे बता 

ये समाज इतना खुदगर्ज कैसे हुआ 

इंसान के रूप के गिरगिट और

गिरगिट के रूप में साप क्यों साथ रखा है 


ए आईने बता ये समाज का 

इस खुदगर्जी से दम नही घुटता

यू कन्याओं के साथ दुष्कर्म होते हुए देख इस की रूह नही कांपती 

क्यों लोग एक्सीडेंट के टाइम पर लोग मदद से जड़ा वीडियो क्यों बनाते है 

क्यों खुदगर्जी ने अपने पैर पसार लिए 

क्यों आंखे खुली होने के बाद भी ये आंखे बन्द ही है 


ए आईने बता मुझे जो देश अपने संस्कृत और अपने सिद्धांत के लिए जाना जाता उस देश में 

ये समाज खुदगर्ज क्यों हुआ 

ए आईने बता मुझे बता!


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