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karan ahirwar

Abstract

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karan ahirwar

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कहने को बातें हैं

कहने को बातें हैं

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कहने को बातें हैं

सुनने को ताने हैं

पहचान का इल्म नहीं

बे नींद कबसे रातें हैं!


रातों के सुकून को

दिन में आंच पर चढ़ाया

और दिन की मेहनत को 

रात में भी दोहराया

तब कहीं जाकर 

सपनो का जहां पाया!


अब क्या छोड़ दूं ये जहां

कोई साथी नहीं है जहां

कभी समंदर का ठिकाना था

अब पानी की बूंद नहीं जहां

दर्द का भी दिल दुखा दिया

और क्या देखना बाकी है यहां!



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