STORYMIRROR

Bhavna Jain

Abstract

4  

Bhavna Jain

Abstract

खलिश

खलिश

1 min
316

एक खलिश हमेशा दिल के कोने में दबी रही

ख्वाहिश वो जो थी अधुरी ही तुमसे लगी रही


काश तुम भी मुझे समझ पाते

उस प्यार को महसूस करा पाते

दिल की गहराईयों को छू पाते

सावन की बरसात में साथ आते

गालों की हसीं सिमटे होठों तक ही रही

एक खलिश हमेशा दिल के कोने में दबी रही


जानते हो तुम प्यार

प्यार सिर्फ जिस्मों का नहीं होता

प्यार सिर्फ कसमों का नहीं होता

प्यार तेरा या मेरा नहीं होता

प्यार कोई व्यापार नहीं होता

तुम्हारे काधें का सुकूं भर चाहत ये बनी रही

एक खलिश हमेशा दिल के कोने में दबी रही।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract