STORYMIRROR

Atharv Mahajan

Abstract

2  

Atharv Mahajan

Abstract

ख़ामोशी

ख़ामोशी

1 min
195

यह ख़ामोशी भी जनाब चिज़ बड़ी जालिम है,

बेइंतहा होगी बातें यहां लेकिन कुछ सुनाई न देगा हमें।


इन खामोशियों का तो अंदाज थोड़ा शौकीन है,

मैंने इनके संग बिताए जो, वो लम्हे भी तो रंगीन हैं।


मौसिकी भी शर्मा जाए ऐसी महफ़िल यहां सजती है,

कभी इत्मीनान का संगीत तो कभी बिना लफ्जों का ही

गीत बजता है।


     


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract