खामोशी के उस पार
खामोशी के उस पार
"खामोशी के उस पार "
अब दिल मे बताने के लिए बहुत कुछ है,
पर हवा जैसे शब्दों को रोक लेती है।
मन कहता है कह दूँ उससे
और डर कहता है.....
शायद उसके दिल की किताब में
मेरा पन्ना खुला ही न हो।
हर शाम जब ख़ामोशी उतरती है,
एक सवाल वहीँ टंगा रहता है....
क्या मैं कभी उसके ख़याल से होकर गुजरता हूँ?
या ये रास्ता सिर्फ मेरे दिल से ही मुड़ता है?
मेरे भीतर एक शांत नदी बहती है...
उसकी हर लहर में
कोई नाम लिखा है,
जो मिटता भी नहीं,
पर बोलता भी नहीं।
मैं नहीं जानता
तुम्हारी धड़कनों की दिशा में
मेरा रास्ता आता है या नहीं,
पर मेरी धड़कनों ने
तुम्हारा मोड़ कभी छोड़ा नहीं।
और ये कविता…
किसी नाम को पुकारती नहीं,
पर इसे पढ़कर
अगर तुम्हें अपना सा कुछ महसूस हो.....
तो समझना,
मेरी हर पंक्ति में,
तुम ही थी।
_TusharB.

