STORYMIRROR

Anshu Shekhawat

Tragedy

4  

Anshu Shekhawat

Tragedy

ख़ामोश दिल

ख़ामोश दिल

1 min
77

ज़िन्दगी कुछ बिखरी सी है

ख़ामोशी भी रुआंसी सी 

वक़्त बेवक्त दिल भर आता है

भूला रिश्ता हर पल रुलाता है


क्या मेरी गलती है औरत होना ?

जो हर पल मेरा इम्तेहान हो जाता है

मैं क़ाबिल होकर भी मजबूर रही

न चाह कर भी खुद से दूर रही


हर लम्हे में मैं खो सी जाती हूँ 

हस्तीे हूँ सबके आगे पर अकेले में 

रो जाती हूँ 

हर चाहत अंदर ही मार के 

मैं हर रात पलकें बंद करके 

सो जाती हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy