"कड़वा सच"
"कड़वा सच"
परियों की दुनिया से निकलकर
जब सपनों को पढ़ना सीखा
बड़ा ही सादा बड़ा ही सरल
रूप रंग उनका देखा...
छोटा सा एक आशियाँ
आँगन से घिरा होगा
सुख-दुःख के साथी संग
प्यार से सजाया होगा...
सम्मान की पूँजी
कामयाबी का सुकून होगा
दुआओं से आबाद
हर कोना रोशन होगा...
स्वाभिमान की महक
आत्मविश्वास चमक देगा
खुशियों की गूँज
जीवनरस को मिठास देगा...
सपनों की दुनिया से निकलकर
अब कड़वा सच जाना
तक़दीर का लिखा
नामुमकिन किसी को मिटाना...
जिम्मेदारियों का कर्ज़
ख़्वाहिशों को गिरवी रखना
कुछ पाना हो
तो होगा कुछ खोना...
दुनियादारी का बाज़ार
भावनाओं पे नक़ाब ढाना
संवेदनाओं को बेचकर
हर हाल में मुस्कुराना...
ईमान जैसे बेवकूफी
दुर्बलता अभिशाप बना
सचेतन का अभाव
पैसा सबका धर्म बना...
अकेले हो आये
अकेले ही होगा जाना
जिंदगी एक अस्थिर संघर्ष
आत्मसंघर्ष से होगा जितना...
