कब लौटेंगे पंछी
कब लौटेंगे पंछी
सुबह सूरज उगते ही
एक नई उमंग से
नीड़ों से निकलकर पंछी (स्टूडेंट्स)
चले आते थे पेड़ (कॉलेज) पर,
अपनी-अपनी शाख़ों (क्लास) में
बैठते थे बैंच पर
चहचहाते थे, मुस्कुराते थे, शोर मचाते थे,
फिर लौट जाते थे अपने नीड़ों में।
तुम्हारे न आने से
ये पेड़ भी है उदास, कुछ परेशान सा,
और डालें भी हैं सुस्त सी, मुरझाई हुई।
अब न तुम्हारे पेन गिरे हुए मिलते हैं
क्लास के अंदर या मैदानों में,
न रजिस्टर के फटे हुए पेज,
न परीक्षा में नकल के लिये
छिपाकर लाई हुई पर्चियाँ,
अब न मिलते हैं
तुम्हारे भूले, गिरे हुए रुमाल, बॉटल, कम्पास बॉक्स।
न दीखते हैं तुम्हारे अक्षर जो बोर्ड पर
टीचर के आने से पहले या न होने पर
लिख दिया करते थे डरते हुए तुम।
वो बैंच भी बीमार सी हैं
जिनपर दिल का शेप बनाकर
लिख दिया है किसी स्टूडेंट्स ने नाम किसी का।
वो रास्ते भी जाने कहाँ खो गए
जो शॉर्ट कट चलकर तुमने बनाए थे,
तब बहुत झुंझलाहट होती थी,
जब लेक्चर में कोई मिलता नहीं था क्लास में,
लेकिन अब उन स्टूडेंट्स की भी आती है याद,
जो क्लास में न बैठकर केंटीन में बैठा करते थे।
सारे मैदान भी सुबह-शाम अब खाली पड़े हैं
कोई नहीं उनमें खेलने वाले
वो सब खेल के सामान निढाल पड़े हैं, बेजान से,
बन्द जिमखाने के अंदर,
रेंग रही हैं उनपर छिपकलियां,
बना रही हैं जाले मकड़ियाँ।
अब घण्टी भी नहीं बजती कॉलेज में,
जिसे सुनकर घड़ी देखने की ज़रूरत न पड़ती थी,
हाँ घड़ी से याद आया,
कॉलेज के स्टाफ़ रूम की घड़ी
न जाने कबसे बन्द है सेल ख़त्म हो जाने से,
ठीक ऐसे ही कॉलेज भी बंद है
बिना तुम्हारे,
जाने कैसा वक़्त है,
कुछ नहीं चल रहा सिवा डर के।
उग गई है बेतहाशा घास, बेलें, खर-पतवार कॉलेज में जहाँ-तहाँ,
लायब्रेरी की सारी किताबें
बन्द हैं अलमारियों में
झांकती हैं गुमसुम अंदर से,
दूर तक रास्तों को निहारती हैं,
कोई ले जाए उन्हें कुछ दिनों के लिये बाहर,
वो घूमना चाहती हैं पर क़ैद पड़ी हैं सिसकती हुईं।
लैब से नहीं उठती दमघोंटू बदबू,
बिना तुम्हारी क्रिया के अम्ल, क्षार, रसायन भी
नहीं देते कोई प्रतिक्रिया,
परखनली, बीकर सब के सब पात्र
चुप हैं बिना किसी आहट के,
कम्यूटर की रगों अब नहीं दौड़ाता करंट,
न स्क्रीन चमकते हैं तुम्हारे चेहरों की तरह।
चॉक-डस्टर सब यहाँ-वहाँ पड़े हैं
कुर्सियों पर, टेबलों पर धूल का अटम्बार है,
पंखे बन्द पड़े हैं अपनी सांसे रोके हुए,
नल प्यासे पड़े हैं बिना पानी के
उनके हलक़ तक पानी है
लेकिन होंठ सूखे हुए हैं,
एक कुत्ता भी है कॉलेज में
जो कई दिनों से बीमार सा है।
जो जहाँ जैसा था, सब वैसा ही ठहरा पड़ा है,
कॉलेज की दीवारों, छत के प्लास्टर भी अब
अपनी जगह छोड़ रहे हैं बिन तुम्हारे।
लौट आओ के अब अच्छा नहीं लगता बिन तुम्हारे,
घर जैसे खाने को दौड़ता है,
लगता है घर की दीवारें अब दबोच लेंगी मुझे,
लेक्चर की आदत होने की वजह से
चुप रहना अब अपने न होने के अहसास को जगाता है,
ये ऑनलाइन-वॉनलाइन सब बेकार के चक्कर सा है,
तुम्हारे कैमरे ऑफ रहते हैं
तो लगता है पागलों की तरह
चिल्ला रहा हूँ बिना अर्थ के,
मज़ा नहीं है ऐसे पढ़ने-पढ़ाने में
वो जो क्लास में होते हैं लेक्चर
उसकी बात ही कुछ और है,
पता नहीं कब लौटेंगे वो दिन,
तुम लौट आओगे
तो दिन भी लौट आएंगे शायद उसी तरह।
सुनों मैंने इन गुज़रते उदास मौसमों में
कुछ ही खोया है
तुमने बहुत कुछ खो दिया है
वो सुनहरे दिन जो हरेक की ज़िंदगी के
शानदार दिन होते हैं कॉलेज लाइफ़ के,
वो तुम न जी पाए इसका मुझे भी अफ़सोस रहेगा,
कोई नहीं लौटा पाएगा तुम्हें
तुम्हारे सुनहरे दिन।
तुम लौट आना पेड़ के पत्ते पीले पड़ने से पहले
मैं इंतज़ार में हूँ
उस पेड़ के नीचे
तुम्हारे लौट के आने तक !
