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Ervivek kumar Maurya

Abstract

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Ervivek kumar Maurya

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कैद कब तक रखेगा

कैद कब तक रखेगा

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मुझे कैद कब तक रखेगा जालिम ऐ जमाना

मैं हूँ एक पंक्षी एक न एक दिन है उड़ जाना

मुझे कैद.............


अभी तक था मैं अनाड़ी

किसी खेल में न था अगाड़ी

न ही था पिछाड़ी

बन के अब खिलाडी सभी चालों को है जाना

मुझे कैद.........


खुशबू सा हूँ महक जाऊँगा चमन में

एक जोश सा हूँ फ़ैल जाऊँगा गगन में

मैं वो आग हूँ जिसको किसी ने ना जाना

मुझे कैद .............


सच के लिए झूठ के सर हैं काटे

हक के लिये संघर्षों के पर्चे हैं बांटे

गुलाम जिंदगी को है कैद से छुड़ाना

मुझे कैद........


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