STORYMIRROR

Dr Manisha Sharma

Abstract

4  

Dr Manisha Sharma

Abstract

काठ की पुतली

काठ की पुतली

1 min
521

ज़िन्दगी के मेले में

भीड़ में अकेले में

इंसान की शक़्ल में 

सब काठ की पुतली हैं


रिश्ते हों या नाते हों

दुनिया भर की बातें हों

नाचती थिरकती

सब काठ की पुतली हैं


कभी करती हैं मुहब्बत

भरी कहीं घनघोर नफ़रत

मुखौटों में छिपे चेहरे

सब काठ की पुतली हैं


झूठ क्या और सत्य क्या

डोरी बंधा सा नृत्य क्या

पल पल बंधी डोर से

सब काठ की पुतली हैं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract