काठ की पुतली
काठ की पुतली
ज़िन्दगी के मेले में
भीड़ में अकेले में
इंसान की शक़्ल में
सब काठ की पुतली हैं
रिश्ते हों या नाते हों
दुनिया भर की बातें हों
नाचती थिरकती
सब काठ की पुतली हैं
कभी करती हैं मुहब्बत
भरी कहीं घनघोर नफ़रत
मुखौटों में छिपे चेहरे
सब काठ की पुतली हैं
झूठ क्या और सत्य क्या
डोरी बंधा सा नृत्य क्या
पल पल बंधी डोर से
सब काठ की पुतली हैं।
