STORYMIRROR

नाकामयाबी

नाकामयाबी

1 min
28K


इस दफ़ा न किताबें बदल पाएँगी और न ही बदल सकेगी उनकी सिलवटें।

इस दफ़ा उन सिलवटों को मोड़कर ही काम चलाना पड़ेगा और उन घिसे कागज़ो में जगह ढूँढ फिर से घुमानी पड़ेगी कलम।

मिटाना चाहूँ भी उन्हें तो लकीरें रह जाती है और उनकी झुर्रियों में जो मेरी नाकामयाबी की चीखें घर कर चुकी हैं अब निकाले नहीं निकलती। 

किताब के पन्ने उन दीवारों से हो चले हैं जिनकें सीनों की हताश सीलन मेरे पैरों को थाँ नहीं देते और लांघ नहीं पाता अपनी नाकामयाबी।

इस दफ़ा न किताबें बदल पाएँगी और न ही बदल सकेगी उनकी सिलवटें।

 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Tarun Sharma

Similar hindi poem from Abstract