जलन पर दोहे
जलन पर दोहे
जलन की अग्नि से जले, प्रेम बंध के गाँव।
जन-उन्नति देख न जलें, तजें जलन का भाव।।
सर्वनाशनी है सखे, जलन भाव की आग।
इससे पूर्व स्वघर जले, ओ मानुज तू जाग।।
कुंठित मन झुलसे सखी, जलन भाव आवेश।
ऐसे कुमति लोगों को, सुमति दो सर्वेश।।
