जख्मों की कथा
जख्मों की कथा
कभी सुनी है कोई ऐसी कथा,
ज़ख़्मो की पीड़ा से जो सराबोर हो ऐसी व्यथा,
तन के ज़ख़्म वक़्त के साथ भर ही जाता हैं,
मगर मन का ज़ख़्म कहाँ किसी को नज़र आता हैं,
मन के ज़ख़्मो का मर्ज मिलता नही बाजार में,
मन के ज़ख़्म रह रहकर आँखों को भिगोते हैं,
मगर ज़ख़्मो का दर्द जुबान से कभी ना कहते हैं ,
घुटता रहता हैं ज़ख़्म खुद को ही दर्द देता हैं।
क्या पुरुष ,क्या स्त्री सब अपना ज़ख़्म छुपाते हैं,
मगर औरों के ज़ख़्मो को कभी अंजाने में,
कभी जानबूझ कर उनके ज़ख़्मो पर नमक मिर्च लगाते हैं।
पुरुष अपना परिवार पालने जब घर से बाहर निकलता है ,
ना जाने कैसे-कैसे ज़ख़्म अपने अंदर लिए वो चलता है,
दो वक्त की रोटी के खातिर किससे, क्या कुछ नहीं सुनता है।
फिर वो पुरुष जब शाम को थका हुआ ज़ख़्मी सीना लिए वो आता है,
अपने परिवार को खुश देख वो अपना दर्द भूल जाता हैं।
स्त्री गर बेटी हो और हो चुकी शादी उम्र उसकी,
रिश्ता ना कोई जब आता है माता-पिता कुछ कहे ना कहे,
लोगों को स्त्री के घर पर होने का खेद बहुत होता है,
जिव्हा की तेज कटार से ऐसे ऐसे ज़ख़्म फिर वो देते हैं,
मन में अपने लिए नफरत का बीज वो खुद अपनी जिव्हा से बोते हैं ,
शादीशुदा गर हो नारी, गोद में जब ना खेलें शिशु प्यारा या प्यारी,
तब सासरे के सारे लोग उस पर प्रतिदिन कटाक्ष करते हैं,
कभी उसे बांझ, तो कभी किसी गालियों से सीना उसका छन्नी करते हैं।
ज़ख़्म नासूर सा देकर उसके मन को, अंजान बन वो बैठते हैं।
ज़ख़्मो की कथा होती है मानो एक जैसी,
मगर किसे पता ज़ख़्मो की दर्द होती नहीं एक जैसी।
ज़ख़्मो का दर्द सहना जब मुश्किल हो जाए,
तब ज़ख़्म सह सहकर वो दुनिया का विरोधी बन जाए।
दो मीठे बोल से सारे ज़ख़्म हृदय के धीरे धीरे भर जाते हैं,
तो क्यों जमाने के लोग इस बात को समझ न पाते हैं
मन में इर्स्या और द्वेष को जगह देकर खुद को तकलीफ देते हैं,
मन खुद का जब हो अशांत तो वो लोगों को नये ज़ख़्म देकर खुश होते हैं।
