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Aafreen Ansari

Others

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Aafreen Ansari

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" मैं, मैं करत मानुष "

" मैं, मैं करत मानुष "

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जिसमें "मैं" का फायदा ,"मैं" का ही नुकसान 

"मैं" का बढ़ता मान देखकर ,"मैं" की जलती जान ।


"मैं" रहे हमेशा अकेला ,"मैं" संग जुड़े न कोये

खो दे सब कुछ अपना में "मैं", "मैं" को तब अपनी गलती का भान होये ।। 


पछताकर भी पाए ना कुछ "मैं", जग में पात्र हंसी का "मैं" होये 

धर्म इंसानियत का रौंद दे "मैं", अपने अहंकार में "मैं" की बुद्धि भ्रष्ट होये । 


"मैं" का जाप करें जो हर क्षण, "मैं" से "मैं" ही पराजित होये 

"मैं", "मैं" करत मानुष, "मैं" की खातिर जग से रिश्ता नाता खोये ।।


"मैं" की आदत जिंदगी में दुख का बीज बोये, "मैं" से जिंदगी के सुख का हनन होये 

"मैं" क्रोध , ईर्ष्या विकार को हैं जन्म देता, वश में जो मानुष "मैं" के होये ।


"मैं" बनकर दीमक कर खोखला "मैं" को, फिर "मैं" अपने कर्मों पर ही रोये

क्षण निकट मृत्यु के "मैं" का पाठ छोड़े, विलंब अति कर दी "मैं" ने तब आत्मा शरीर से अलग होये ।।



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