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Aafreen Ansari

Others

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Aafreen Ansari

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अनाथ हूँ न

अनाथ हूँ न

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नन्हें से आंखों में ख्वाब है कहे अनकहे से,

मगर मेरे ख्वाबों का कोई वजूद नहीं,

पल रही हूं मैं लोगों के एहसानों से, 

क्योंकि मेरा अपना कोई घर नहीं, 

कहाँ है मेरे माँ-पापा मैंने उन्हें कभी देखा नहीं, 

कहते हैं लोग मुझे किसी ने कचरे के डिब्बे से था निकाला, 

फेंक दिया था किसी ने मुझे वहां, 

वहां से निकाल दुनिया रूपी गटर में जाने किसने मुझे छोड़ा। 

मर रही थी मैं, तो मुझे मर जाने दिया होता, 

मेरा तो भविष्य वैसे भी उसी क्षण मर चुका था, 

जिस पल कचरे में था मुझे फेंका गया।

सब मुझे घिन भरी नजरों से देखा करते हैं।

सब के सब मुझे मनहूस मनहूस कहकर पुकारा करते हैं, 

बचपन मेरा कहाँ है मैंने जिया ही नहीं, 

मेरी मासूमियत, मेरे भोलेपन से सबने अपना काम लिया। 

पढ़ाई करने के लिए होता है स्कूल में माता-पिता का नाम जरूरी, 

मैं तो "अनाथ हूं न फिर कैसे करूंगी मैं अपनी पढ़ाई पूरी । 

आँखों के सपनो को पंख देकर मैं भी उड़ान भरना चाहू, 

जानती हूँ ये मुमकिन नहीं मैं यथार्थ से न अंजान हूँ। 

मेरे नन्हे से हाथों में झूठे बर्तन पकड़ाकर सफाई का काम देते है,

फ़िर उसके ऐवज में मुझे कुछ खाने को है देते, 

मालूम नहीं है माँ-पापा मुझे कैसे थे दिखते, 

मगर जब भी देखूं लोगों को अपने माता-पिता के संग, 

सोचती हूँ मेरे माँ-पापा भी जरूर उन्ही के जैसे होंगे दिखते। 

मेरा भी मन अपने मां-पापा के संग खेलने का है करता, 

क्यों फेंका होगा उन्होंने मुझे ये बात हरदम मेरे मन को है झिन्झोड़ता,

मन में ढेर सारे सवालों को, सच्चे झूठे जवाब बनाकर मैं खुद को समझा लेती। 

क्या करूं "अनाथ हूँ न" रोने से क्या होगा,

इसलिए मैं अपने आंसुओं को खुद ही पोंछकर दुनिया के तमाशे में खुश हो लेती।

क्या सच में मैं इतनी मनहूस थी,

जो उन्होंने मुझे अपनाना जरूरी ना समझा, 

मैं तो उनका ही अंश थी न, 

फिर क्यों उन्होंने मुझे पैदा कर खुद से दूर किया।

बना दिया अनाथ मुझे, 

खिलौने संग खेलने, आइसक्रीम खाने को मेरा भी है जी तरसता, 

जब भी किसी हंसते खिलखिलाते बच्चे को मैं देखूँ, 

ऐसा हक मेरा भी तो था ये सोच, 

नन्ही सी आंखों में अश्कों के मोती बरस आते है, 

घुटनों में छिपाकर सिर में रो लेती हूँ, 

क्या करूं छोटी हूं मगर दर्द बहुत है, 

फटे पुराने कपड़ों से अपना तन ढक लेती, 

क्या करूं "अनाथ हूँ न" इस कारण जहां भी मिले थोड़ी जगह, वहां मैं सो लेती । 

न मां की थपकी, न पापा का प्यार,

खुले आसमान को चादर समझकर हाथ पैर मैं अपने समेटकर नींद मैं अपनी पूरी कर लेती।



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