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Krishna Basera

Abstract

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Krishna Basera

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ज़िन्दगी

ज़िन्दगी

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कभी ख़्वाबीदा सहर सी,

कभी गमगीन शफ़ाक़ है ज़िन्दगी।

खुली आँखों से देखा हुआ,

अधूरा-सा एक ख़्वा है ज़िन्दगी।


वक्त की तपिश से लड़ रही,

एक प्यास है ज़िन्दगी,

जो सबके दिलों मे पल रही,

वो एक आस है ज़िन्दगी।


कभी खुद से, कभी खुदा से,

हर्फों मे एक गिला है ज़िन्दगी।

वक्त-बेवक्त की आँधियों का दिया,

एक खूबसूरत-सा सिला है ज़िन्दगी।


कभी हर पल तन्हा-तन्हा-सी,

कभी माशूका-सी आशना है ज़िन्दगी।

कभी मुख़्तसर-सा मर्ज़ है,

कभी उम्रभर का दर्द है ज़िन्दगी।


कभी गुलशन-गुलशन-सी,

कभी रेगिस्तान-सी बंजर है ज़िन्दगी।

हर एक पल, एक नया मंजर है ज़िन्दगी।


कभी हक़ीक़त-सी है लगती,

कभी फ़क़त एक क़यास है ज़िन्दगी।

हर एक पल, एक नयी तलाश है ज़िन्दगी।


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