ज़िन्दगी तू मुकम्मल नहीं
ज़िन्दगी तू मुकम्मल नहीं
ज़िन्दगी तू मुकम्मल नहीं किसी की भी,
ज़िन्दगी तू साथी होती नहीं किसी की भी।
दुआ पूरी हो मुकम्मल हो जाए ज़रूरी नहीं,
ज़िन्दगी हक़ीक़त में चार दिन की होती सही।
ज़िन्दगी कहते किसी से भेदभाव करें नहीं,
पर हक़ीक़त में ज़िन्दगी अमीर की सही।
ज़िन्दगी चार दिन की जीना सब चाहे सही,
प्यार सच्चा कम झूठा ज़्यादा होता है सही।
ज़िन्दगी वीरान खंडहरों के जैसे लगती सही,
ज़िन्दगी कभी पतझड़ कभी बहारों सी सही।
ज़िन्दगी व नश्वर शरीर आपस में लगते यार,
ज़िन्दगी को सही मायने में अमीर से प्यार।
