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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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जिंदगी खुली किताब

जिंदगी खुली किताब

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जिंदगी खुली हुई किताब है, जिसकी

हर जगह ही जीत पक्की है, उसकी

यहां सरलता-सादगी पसंद है, उसकी

पूरी दुनिया इबादत करती है, जिसकी


सादा-जीवन, ऊंची-सोच है, जिसकी

शूल मे भी खुश्बु महकती है, उसकी

जिंदगी खुली हुई किताब है, जिसकी

हर जगह ही जीत पक्की है, उसकी


इसलिये झूठ बोलना सब छोड़ दो,

सच बोलना अब सब शुरू कर दो,

सच बोलना सदा आदत है, जिसकी

बंद चरागों में रोशन जिंदगी है, उसकी


यहां साफ-सुथरी जिंदगी है, जिसकी

टूटे शीशे में भी पूरी तस्वीर है, उसकी

जिंदगी खुली हुई किताब है, जिसकी

हर जगह ही जीत पक्की है, उसकी


छद्म वेश पहनना आदत है, जिसकी

हज़ार सितारों में बुझी लौ है, उसकी

इस ज़माने में साफ नियत है, जिसकी

हर समुद्र के साहिल की नाव है, उसकी


जिसे पढ़ना, साखी सबके लिये सरल है

वो दुनिया क्या खुदा की भी है, पसंदगी

जिंदगी खुली हुई किताब है, जिसकी

फिर तो पूरी दुनिया ही मित्र है, उसकी


जो भी ईमानदारी की लेते है, घुड़की

उसे सफलता की मिलती है, पुड़की

सामने जो बचाते है, सत्य की चुटकी

वहां न टिकती कभी झूठ की खिड़की


जीवन किताब न रखो, कभी रुकी-रुकी

जो खुला पढ़ता हुआ रखते है, जिंदगी

दुनिया मे सदा उन्नति होती है, उसकी

जिंदगी खुली हुई किताब है, जिसकी

हर जगह ही जीत पक्की है, उसकी।


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