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Meena Mallavarapu

Abstract Inspirational

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Meena Mallavarapu

Abstract Inspirational

जाने दे

जाने दे

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रेत की तरह फ़िसल रही ज़िंदगी हाथों से

कुछ कर पाऊं...रोक लूं उसे...रुकती नहीं

कस कर पकड़ लूं , फिसलने न दूं हाथों से

खड़ी-ख़ड़ी बेबस-है आस,गुज़रते पल कहीं

खाएं रहम मझ पर और कर लें गति धीमी

पर यह पल ,यह वक्त,यह समय सुनते नहीं

है हर पल शून्य का पर्याय--नहीं मतलब तुझसे

किसी की सुनने की ज़रूरत ही क्या उसे

बेबसी और लाचारी सुहाती नहीं,क्या मांगे उससे

हर पल को संजो ले, सजा ले, संवार ले बेझिझक

ओर निकल जाने दे हाथ से उस शून्य में

रेत के कणों के जैसे , फ़िसलना उनकी फ़ितरत!


आते जाते पलों की गरिमा पर आंच न आने दे

है सौगात ज़िंदगी की, नेमत नायाब उसकी

बेबसी क्या लाचारी क्या -पल आने दे जाने दे !


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