इतनी सुंदर क्यूँ होती है
इतनी सुंदर क्यूँ होती है
सौम्य परत चढ़ाए भीतर देवत्व को सजाए
अवसाद में भी मन को वज्र सा संभालती
ये स्त्रियाँ इतनी सुंदर क्यूँ होती है।
कांस्य वर्ण कवच चढ़ाए तन पर
सुनहरे सूरज का नूर भरे पतली पगदंड़ीयो से गुज़रती
के बागानों में झुलसती स्त्रीयाँ समझ से परे क्यूँ होती है।
सब्जी के ठेले को संभाले मीठी वानी चूल्हे पर पकाती
रसोई की महारानी देखो मर्दाना हर रुप निभाती
रूपक बन जाती ये स्त्रीयाँ इतनी हसीन क्यूँ होती है।
चिंतापूर्णी कंचनवर्णी रुप कुमारी
नववधू जब बनती है कोमल तन के भीतर
हौसलों का उफ़ान भरती है तब
क्रोध में कंपायमान विपदाओं की आदी
अनिष्ट के आगे ना हारी नारी धैर्यवान क्यूँ लगती है
गंगा सी पावक राजसी वैभव
अपनी आँखों में पाले अदम्य आकर्षित
शर्म के शृंगार से सजी स्वामिनी इतनी शानदार क्यूँ होती है।
आश्रित करती कोख में गर्भ को
नीड़ बनकर जीव को पाले थर्थराती जाँघों से जब
जन्म देती जीव को माता जन्म मृत्यु की क्षितिज पर खड़ी देवी सी क्यूँ लगती है।
परिवार की नींव जीवन की धुरी संसार
जिस बीन सूना वो साम्राज्ञी उमा का रुप ही तो लगती है
कर लो कद्र नारी की जीवन बाग की गरिमा जो लगती है।
