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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract Inspirational

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract Inspirational

"इतना सोच"

"इतना सोच"

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तू किस बात का करता, इतना सोच है

एक दिन तेरी भी अवश्य होगी, मौज है

तू चलता चल, धुन में यूँ ही रमता चल,

दिल पर एक बार लगा तो सही चोट है

फिर देख दुनिया कैसे न करती नोट है

तब कर पायेगा, तू अपनी सही खोज है

जब तू दीपक जैसा जलेगा हर रोज है

तू किस बात का करता, इतना सोच है

हर आदमिबही होता दुनिया में चोर है

व्यर्थ के विचारों की मिटा तू फ़ौज है

नकारात्मक विचार ही मिटाते जोश है

तुझको गर चलना आसमाँ की ओर है

शांत कर पहले अपने भीतर का सौर है

तू किस बात का करता, इतना सोच है

श्रम से ही बनता, कोई यहां सिरमौर है

जो भीतर से मिटा देता, अपने खोट है

वो बनता फिर कोहिनूर अनमोल है

जो चिंता का मिटा देता, हर स्त्रोत है

वही बनता जग-दलदल में सरोज है



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