इश्क का रंग
इश्क का रंग
कैसा समय आया है इश्क का,
कोइ इश्क में मदहोंश बन जाता है,
कोइ इश्क के लिये तड़प तड़पकर,
मजनू की तरह ठोकर खाता है।
इश्क का रंग जिसको लगता है,
उसे दिन को चांद नजर आता है,
इश्कमें डूबनेवालों को देखकर,
सूरज भी बादलों में छूप जाता है।
इश्क में दिवाना बनकर इन्सान,
कभी कभी शायर बन जाता है,
कोइ इश्क में नाकामयाब होकर,
इश्क का मरीज़ बन जाता है।
जो अढाई अक्षर को समझता है,
उसके रोम रोम में इश्क लहेराता है,
जो इश्क को सही समजता नहीं,
वह सूमशान बनकर भटकता है।
इश्क तो खुदा की देन है दोस्तो,
इश्क करना कोइ कसूर नहीं है,
इश्क के बिना दुनिया में "मुरली",
इन्सान जिंदा मुर्दा बन जाता है।
