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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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इश्क और वक्त

इश्क और वक्त

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रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ इस मंज़िल में लाया है मुझे 

दर्द उठता है किसी को और तड़प जाता हूं मैं 


बद-गुमानी को बढ़ा कर तुम ने ये क्या कर दिया 

ख़ुद भी तन्हा हो गए मुझ को भी तन्हा कर दिया 


एक दीवाने को जो आए हैं समझाने कई 

पहले मैं दीवाना था और अब हैं दीवाने कई

उम्र भर की बात बिगड़ी इक ज़रा सी बात में 

एक लम्हा ज़िंदगी भर की कमाई खा गया 


जो कहना हो कह डालो हो जाएगा जी हल्का

जो बात है कहने की दिल में उसे क्या रखना

मिरी बे-ज़बान आँखों से गिरे हैं चंद क़तरे 

वो समझ सकें तो आँसू न समझ सकें तो पानी 


जी में आता है कि दें पर्दे से पर्दे का जवाब 

हम से वो पर्दा करें दुनिया से हम पर्दा करें 

दिल की उजड़ी हुई हालत पे न जाए कोई 

शहर आबाद हुए हैं इसी वीराने से 


वो आइना हूँ जो कभी कमरे में सजा था 

अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ।


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