इंक़िलाब लिखुँ
इंक़िलाब लिखुँ
आज सोचता हूँ मैं और क्या लिखुँ
क्या नहीं लिखा जो फ़िर अब लिखुँ
कई कलमकारों का आवाज उकेर चुका
फिर भी चूक गया क्या जो अब लिखुँ।।
क्या लिखुँ उन निकम्मे हुक्मरानों का
गैरजिम्मेदाराना उनके बेतुके बयानों का
नारी की लाज में मुद्दा तलाशते हैं जो
उन्हें जानवर लिखुँ या जह्लाद लिखुँ ।।
राजस्थान लिखुँ या फिर मणिपुर लिखुँ
राजधानी लिखुँ या फिर हाथरस लिखुँ
तेज़ाब से झुलसी उन चेहरों की दर्द से
फाँसी के फंदे की कसता चीत्कार लिखुँ।।
पस्त है तैयारियाँ मगर मस्त है मालिक
पानी में डूबा जगत जनता आक्रोशित
एक दूजे के माथे मलाल मढ़ते इन्हें
खलनायक लिखुँ या नालायक लिखुँ ।।
शिक्षा के विकास के नाम व्यापार है चलता
शिक्षित युबाओं के भविष्य दावँ पे लगता
लाखों खर्च करो मगर नौकरी दस हजारी
बांटते वजीर-ए-आला और क्या लिखुँ।।
इक कलम जो हूँ लिखता रहूंगा नित
छल कपट देख टोकता रहूंगा नित
प्रतारकों के रंगों से लाल लहू निचोड़ कर
सोचता आज फिर से इंक़िलाब लिखुँ।।
