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Rekha Mohan

Abstract


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Rekha Mohan

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हवाओं की सदाओ

हवाओं की सदाओ

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हवाओं की सदाओ

 हवाओं की सदाओ को झोकों में सुनाता है

कोई धीमे से कर्ण छिद्र में कोई गाता है .

किसी शून्य से स्वर सा गूंजता आता कौन

अपनी और खींचता कुछ सुझाता जाता कौन.

मुड़ेर पर बैठा पंछी अपनी भाषा में कुछ कहतें

कभी पास आ सामने बैठ चुगते से बुलाता है .

कबूतरों का झुण्ड छत पर बैठ गुटरु गु सा सुनाना

कभी पंखो को फडफड़ा आवाज़ हवा दे जाता है .

हवा तेरे अंदर कितना अनुमाद है हर पाता नाद

जिससे ये पोषण धरा पर सृष्टि आवाद आता हस्वरचित


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