हरा - प्रकृति माँ के विभिन्न रूप
हरा - प्रकृति माँ के विभिन्न रूप
हरे रंग का है यह चोला, स्कंदमाँ को आज चढ़ाती हूँ।
सदा प्रकृति को जो दर्शातीं, उनको वंदित मैं करती हूँ।
चेतना का निर्माण जो करतीं, ऐसी देवी को ध्याती हूँ।
भवसागर से जो हैं तारे, मैं उनको आज मनाती हूँ।
अधिष्ठात्री माँ हैं प्यारी, मैं नित-नित शीश नवाती हूँ।
शत्रु पक्ष को निर्बल कर दे, मैं उनके गुण गाती हूँ।
दुर्बलता को जो हैं हरतीं, मैं उनको निसदिन भजती हूँ।
पौष्टिकता के गुणों को देतीं, मैं सौगात है इनसे पाती हूँ।
माता ही आधार जगत का, मैं इनको नतमस्तक करती हूँ।
'स्मृति' के मन में जो हैं विराजी, अर्पण खुद को अब करती हूँ।
