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बेज़ुबानशायर 143

Inspirational

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बेज़ुबानशायर 143

Inspirational

हिंदी की व्यथा

हिंदी की व्यथा

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मैं हिंदी भारत का गौरव,

मैं हिन्द का मान हूँ.

राष्ट्रप्रेम की सकल विश्व में 

एक अमिट पहचान हूँ.


आज प्रतिस्पर्धित युग में,

मैं उपेक्षा का दंश झेल रही हूँ.

अपने ही देश में अपनों के मध्य स्वयं को,

गौण होता देख रही हूँ 


मेंरी कदापि चाह कि वर्ष में एक दिवस,

मेरे सम्मान में प्रतिवर्ष मनाया जाए.

या कभी मेलों में तो कभी शासकीय कार्यालयों की 

अलमारियों में सजाया सजाया जाए.


हे! मनुजो मैं चाहूँ यही कि,

नित्य व्यवहार में तुम मुझे सादर अपनाओ. 

मौखिक, लिखित सम्प्रेषण में,

हो सहज मुझे उपयोग में लाओ.


 है अतिसमृद्ध साहित्य मेरा,

उसका हार्दिक सम्मान करो.

 अथक से तुम अपने उसे,

संरक्षण सदा प्रदान करो.


चीन हो चाहे, या रूस, या जापान,

यूँ ही नहीं कोई वैश्विक महाशक्ति कहलाया है.

मातृभाषा को व्यवहार में लाकर सबने संसार में 

अपना परचम लहराया है.


मेरी इस चाह को तुम अवश्य पूर्ण करोगे,

यही मेरी एक लघु अभिलाषा है.

अपने उत्थान और उत्कर्ष की,

मुझे हर भारतीय से आशा है.


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