हे गंगे !
हे गंगे !
गंगा को हँसते देखा था
ये कलकल करती बहती थी
मैं सब पापों को हर लूँगी
ये पतित पावनी कहती थी
त्रय ताप हरण करने वाली
शीतल निर्मल थी जलधारा
हर हर का शोर मचाती थी
तोड़ते समय गोमुख कारा
गंगा को हँसते देखा था
क्लिष्ट पाषाणों को तोड़ ढेल
जब मैदानों में आती थी
बहुतृषित भूमि को सिंचित कर
नयनाभिराम बन जाती थी
कृषकों में जीवन ज्योति जगा
ऊर्वर भूमि को सींच सींच
शिशु सा हमको पोषित करती
गंगा माँ तभी कहाती थी
गंगा को हँसते देखा था
पर फिर इंसानी स्वार्थ बढ़ा
लग गये कारखाने तट पर
गंगा जल को दूषित करने
मिलने लगे रसायन व सीवर
इस पर भी जब देखा हमने
माँ नही तनिक भी क्रुद्ध हुयी
बढ़ गया हमारा दुस्साहस
धारा टिहरी में अवरूद्ध हुयी
पर माँ सचमुच माँ ही तो है
हैं ममत्वयुक्त हृदय विशाल
रेतियाँ ऊभर आयी तल की
पर हुयी नहीं तनिक विकराल
गंगा को हँसते देखा था
छुप छुप कर रोती है गंगा
अब देख द्वीप अपने पथ में
मानो टाट जुड़ आये हो
मलमल के कोमल कपड़े में
यह देख दशा गंगा माँ की
मन व्यथित क्लांत हो जाता हैं
मातृत्व का ऋण भी प्रभात
ऐसे क्या कोई चुकाता हैं
गंगा को हँसते देखा था।
