हां...ज़िंदा हो तुम
हां...ज़िंदा हो तुम
हूं गुमसुम मगर गमगीन नहीं
अकेली ज़रूर हूं पर तन्हा नहीं,
झूठे आदाब नमस्ते से दूर रहती हूं ,
होठों पर चुप्पी की परत रखती हूं
खलबली अंदर होती तो है अक्सर
धीमे मन की आवाज़ सुन लेती हूं,
झूठी हंसी मुझको अब आती नहीं
नाज़ नखरे ये चालाकियां लोगों की
देख के ज्यादा हैरान मैं होती नहीं
लोगों के मुखोटों से मैं अंजान नहीं,
दुनियां की दिलदारी दिखावटी लगती है
चिकनी चुपड़ी बातें सजावटी लगती है
बिन मतलब के यहां दान भी नहीं होता
दस दे के हजार की गड्डी से जेब भरती है,
तब भी ना अफसोस ना ही शरम है
बस यही मामला आजकल चरम है
इंसानियत काली बदली में छुप गई
पारा ठंडा मगर मिजाज़ इनका गरम है,
सच्ची खुशी बिलकुल सादी होती है
सुख दुख से जब आंखें भी भरती हैं
हंसने बोलने का जब मन करे भरपूर
तब हर मौसम में नई कलियां खिलती हैं,
पराया होकर भी जब समझे कोई तुमको
तब समझो कि जी रहे हो तुम
अब सच में ज़िंदा हो तुम... हां ज़िंदा हो तुम।
