STORYMIRROR

डॉ0 साधना सचान

Abstract

4  

डॉ0 साधना सचान

Abstract

हालात आजकल

हालात आजकल

1 min
271

(हालात आजकल)

कौन कब कहाँ छूटे,

कब कौन कहाँ रूठे,

जीवन के तार टूटे,

ऐसे हालात पले।


एक- एक चल दिये,

बुझते जीवन दिये

मन व्याकुल हो रहा,

कैसे मुस्कान खिले?


बीमारी लाचारी बनी,

दुनिया दुखारी बनी,

नहीं समझ में आये,

ये झंझावात चले।


प्रभु राम रक्षा करें,

सब जन सुखी रहें,

विनती करूँ मैं प्रभु,

दीप खुशी के जलें।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract