गुप्त कथा
गुप्त कथा
एक बात कही भोले मन ने
रूठ झगड़ मित्रों से अपने
मां की गोद में बैठा था
आंचल को ओढ़े बोला था
दोस्त नहीं इनमें से मेरा
मोह पाश का है यह फेरा
हर बात को लड़ने आते हैं
ताकत का धौंस जमाते हैं
बात एक नहीं मीठी कहते
मेरी तो कुछ भी न सहते
न इनके साथ अब रहना है
गैरों से अब क्या कहना है
मां लाड लड़ाते बोली थी
सर पर हाथ को फेरी थी
बात नहीं ऐसी हैं कहते
प्यार मोहब्बत से है रहते
भगवान कृष्ण को याद करो
सीख उनसे संवाद करो
सबको याद करते थे
बड़े प्यार से रहते थे
रुष्ट हो वह बोल उठा
मन डगर भावों में डोल उठा
बात एक न करना उनकी मुझसे
जीवन उनका बेहतर सबसे
वह सकल लोक के नायक हैं
हम भू पर केवल अभिनायक है
वह तो जगत के स्वामी हैं
हम में तो लाखों खामी है
गर जीवन होता उनका जैसा
तब ही दुखी होता आखिर कैसा
गर मैं कृष्ण बन जाता
सुख से जीवन तर जाता
जिसके हाथ सुदर्शन रहता
जिसके पीछे शेष का फेरा
जीवन गर ऐसा सुखमय होता
तब दुख का बोझ न धोरा होता
इसी बात पर सांस लिया
मां की गोद में विश्राम किया
रुठा मन क्या बोल गया
नेत्र मूंद अब सो गया
मां का चितवन डोला था
कृष्ण प्रेम जो खोया था
कुछ ऐसी बातें बोल गया
गलत तराजू तोल गया
सब काम छोड़ मां आधे-आधे
बैठी बोलने राधे-राधे
श्याम उसे तुम माफ करो
नादानी कि तुम ढाल बनो
बालक तो बचकाना है
ज्ञान-समझ ना जाना है
अपने पुत्र को माफ करो
भूल साफ तत्काल करो
कंबल उड़ा मां दूर गई
सपनों की दुनिया छोड़ गई
जिसमें कई सैर सपाटे थे
विभिन्न रंग के धागे थे
सपनों की गर हम बात करें
तो अपूर्व इसे संवाद कहे
मस्तिष्क में वह ही आते हैं
जो प्रभु दिखाना चाहते हैं
सपने तो जीवन है पूरे
जीव रहस्य तुमसे कह रहे
समय-समय पर आते हैं
नए-नए चरितार्थ सुनाते हैं
अब बालक की बारी थी
गुप्त कथा सुनाने थी
जो कृष्ण बनना चाहता था
उनका दुख कहां जाना था
मध्यरात्रि समय हुआ
नया स्वप्न प्रारंभ हुआ
ढोल नगाड़ों की धनि सुनी
सजी-धजी बारात दिखी
वसुदेव घर को जा रहे थे
बंधन में बंधकर आ रहे थे
तभी गूंजती आवाज सुनी
आकाशवाणी की बात सुनी
हथकड़ी पहना डाल दिया
बहुत उनका अपकार किया
क्षण क्षण उन्हें सताते थे
हर एक गर्भ को मारे थे
अब कृष्ण की बारी थी
दुखों की लगी कतारें थी
अवतार लेकर प्रकट हुए
नन्हें नेत्र थे भटक रहे
मरे भाइयों पर नजर पड़ी
नन्ही आंखें थी रूढ़ पड़ी
मां-बाप को छोड़ जाना था
इस दुख को कैसे पचाना था
कैसे एक नन्हा सा बालक
छोड़ मां-बाप हो जाएगा
कैसे भारी अश्रुयों का
बोझ ढो तो पाएगा
हर दिन हमले होते
दोनों मां-बाप रोते
मोहब्बत की बरसाते थी
पर काली घटा डराती थी
मित्रों का अपहरण होता
मां बाप पर संकट होता
गोकुल वाले सताए जाते
पर कृष्ण कहां यह सह पाते
बंजारों सा जीवन जीते
जगतपति जगन्नाथ
धोती कुर्ता जामा पहने
दौड़े रणछोड़ श्याम
प्रेम करा जिस राधा से
दूर रखा हर बाधा से
सब प्रिया प्रीतम कहते थे
एक दूजे बिन न रहते थे
खुद से ज्यादा चाहा था
दूर न जाना वादा था
जिनको पूजा साथ में जाता
साथ वह भी कहां निभाता
सब छोड़ चले थे वादे
रूठी पड़ी थी राधे
बहुत दूर तक दौड़ी थी
कृष्णा ने हद न छोड़े थी
प्रेम अपना कुर्बान चले थे
छोड़ सब सम्मान चले थे
आंसू भर के आंखो में
जिनकी गिनती लाखों में
नए मां-बाप जो पाए थे
जिनसे लाड लड़ाए थे
उनको भी छोड़ जाना था
दुख को गटके जाना था
इस नन्हे से बालक ने
दुख को खूब छुपाया था
मीठी मीठी मुस्कान भर
झूठा दृश्य दिखाया था
बाल काल का हाल यही है
आगे जी बात तो छोड़ो जी
इतना जो सह सकता है
कृष्ण अलावा कोई नहीं
सुखमय सुखमय जीवन में
सुख का सुख तो छोड़ो जी
गर गम जब भी कम मिलता था
तब ही सबसे सुखमय जी
भगवान समझकर कृष्ण का
जीवन आसान न सोचो जी
हाथ जोड़ कर सर झुकाए
नम आंखों से देखना जी
नम आँखों से देखो जी।
