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Mahendra Kumar Pradhan

Abstract

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Mahendra Kumar Pradhan

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गुलाल

गुलाल

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देखो मेरी अंजलि को

कैसे सजाए हैं ,

रंग बिरंगे शुभ फाग से ।


सुनो आवाज दिल की

कैसे बुला रहे हैं तुम्हें

स्नेह और अनुराग से ।


तुम्हारे इंतज़ार में सनम

हर लम्हें बेकरार हैं ,

आओ रंग दूं तुम्हे गुलाल से ।


सारी नशा उतार दूं सनम

चूम के होंठों को तुम्हारी

मेरे रसना की गुलाल से ।


तन्हा दिल उतर आया है

मेरी हथेली में, सजकर

सतरंगी गुलालों से ।


हरदम तन्हाई में जीता हूं,

तरसते हमारी

प्रीत मिलन की खयालों से ।


नयना तरसे ,आंसू पीते

जुदाई में बरसों बीते

लौट आजा परदेशिया ।


तेरे प्रेम की विरह ज्वाला में

जल जल के दिन रात

देखना मैंने कैसे जिया पिया ।


हरे हैं सारे छाले ज़ख्म

काम न आते कोई मरहम

अब और सहे न जाते ।


तुमसे जो लिपट जाता

कस के सनम सीने में ,

सब छाले ज़ख्म मिट जाते ।


आके मल दो गूलालों को

तुम्हारे कोमल हस्तों से

मेरे अंग अंग में ।


जीवन में रंग भर जायेगा

हर दिन प्रीत का होली होगा,

सनम तेरे संग में ।



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