गरजने वाले बादल
गरजने वाले बादल
सुनते रहे हैं
बादल गरजने वाले
कभी बरसते नहीं
अपने गर्जन से कंपा जगत को
चुपचाप चले जाते हैं
बिना ही बरसे
क्या सत्य है
क्या झूठ है
बादल गरजने वाले
बरसते क्यों नहीं
संभव है कि मजबूर हों
सिद्धांतों की बेड़ियों से बंधे चरण वाले
मर्यादा की ढाल में छिपे
कोशिश कर भी
बरस न पाते हों
संभव है क्षमा देवी के पुजारी
अहित का भी हित चाहने वाले
आखरी क्षणों तक संघर्ष टालने के उत्सुक
रोक रहे हों खुद को बरसने से
मात्र पंच गांवों पर शांति संधि स्वीकारने को तत्पर
शांति दूत बना कृष्ण को भेजते पांडव ही हों
बादल गरजने वाले
बरसते नहीं हैं
सचमुच एक भ्रांति है
गरजने वाले बादल
बरस सकते हैं
बरसते नहीं शायद
जानते हैं कि उनका बरस जाना
भूचाल ला देगा
महाभारत सम विनाश ला देगा
रोकते रहते खुद को बरसने से
कमजोर नहीं है
सत्य में बरसने वाले बादल हैं
अपरिहार्य हालातों में
जब मिटाकर भी पुनः सृजन अनिवार्य होगा
बरस जायेंगे
गरजने वाले ये बादल।
