गर जिंदगी इतनी आसां होती
गर जिंदगी इतनी आसां होती
गर इतनी आसां होती तो ऐ ज़िन्दगी
तुझसे निपट न लेती, क्या बैठी रहती
अब तक इस ऊहापोह में
कि कैसे ,कब, क्यों और कहां से
करूं शुरुआत तुझसे दोस्ती की
है इतनी दूर- दूर तक पहुंच तेरी
करती है तू राज संपूर्ण जगत पर
है मेरी हस्ती क्या तेरी नज़र में
समझने की कोशिशें करे जा रही हूं
जब से होश संभाला, जब से खोली आंख
पढ़ना लिखना सीखा,शिक्षकों की बदौलत,
कुछ कुछ किताबों की उस दुनिया से
जो थीं डिग्रियों से परे
अध्ययन की थी बेशुमार दौलत सामने
बाहें फैलाए, किया जिसने मेरा आह्वान
दिखाए सब्ज़ बाग़ इतने,लगा, होगी अवश्य
तुझ से यहीं कहीं जान पहचान
पर तू तो थी किताबों से परे
आ जाती क्या इतनी आसानी से हाथ
मैं बेचैन,बेताब ढूंढती ही रह गई तेरा पता
कुछ शुभचिंतकों ने दी सलाह, सफलता ही है
जीवन की कुंजी, यहां वहां क्यों भटक रही हो
बनजारों वाला हाल बना कर
बनाओ ख़ुद को दुनिया के क़ाबिल
जीवन को जीना है अगर, समझना है अगर
मैंने भी सोचा,हैं यह सब शुभचिंतक मेरे
दुनिया देखी हैं मुझसे ज़्यादा
शामिल हो जाऊं अब
दुनिया की दौड़ में,उसकी भीड़ में
हो जाएंगे दर्शन ज़िन्दगी के शायद उस मेले में
मगर लगी निराशा हाथ,न मिला कहीं भी
जीवन का सुराग,ढूंढती ही रही
थकी हारी,वह राह
पहुंचा दे जो मुझे मेरी मंज़िल तक
अब कैसे होगी मयस्सर ज़िंदगी की पहचान
क्या है जो भूली हूं मैं अपने इस सफ़र में
चारों ओर फैलाई जब नज़र
दिख गई अचानक
आशा की एक चमचमाती किरन
और लगा पहुंच गई मैं मंज़िल के करीब
उस किरन ने किया रोशन वह रास्ता
जिससे मैं अब तक थी अनजान
वह राह जो ले चली मुझे
अपने अंतर्मन की ओर ,बन कर मेरी
मार्ग दर्शक, मेरा आइना, मेरा प्रतिरूप
ज़िंदगी से हुई मुलाक़ात -
जान पहचान की शुरुआत
मुश्किलें आसां तो नहीं हुईं
मगर मिली हिम्मत मिला सुकून
जुड़ गया उससे दोस्ती का रिश्ता ।।
